निजी प्राइमरी स्कूलों के अनुदान ; यूपी सरकार पर बढ़ा दबाव

             निजी तौर पर प्राथमिक व उच्च प्राथमिक शिक्षा दे रहे विद्यालयों के लिए अनुदान तय करने का दबाव राज्य सरकार पर बढ़ रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी एक मामले में सरकार को निर्देश दिया है कि वह इसके लिए नीति तय करे।
              अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा का अधिकार कानून-2009 को लागू करने के लिए निजी स्कूलों को आर्थिक मदद व मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए नीति तय होनी चाहिए। अदालत ने राज्य सरकार से कहा है कि वह 1989 में बनी अपनी नीति की समीक्षा करे।
              हाईकोर्ट के समक्ष यह प्रकरण ग्राम विकास सेवा समिति की एक याचिका पर आया था जिसकी सुनवाई न्यायमूर्ति एमके गुप्ता ने की। याची की ओर से अधिवक्ता अनिल तिवारी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21-ए में शिक्षा को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है।
               इसके अनुसार छह से 14 साल के बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षित किया जाना है। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा कानून 2009 में लागू किया गया।
               शिक्षा देने का काम सरकारी विद्यालयों के साथ ही निजी विद्यालय भी कर रहे हैं जिन्हें सरकार की ओर से मदद करने की कोई नीति नहीं है। याचिका में कहा गया कि याची संस्था भी विद्यालय चलाती है लेकिन उसे सरकार से कोई अनुदान नहीं मिलता।
               जून 2014 में केंद्र सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत इस विद्यालय का नाम ग्रांट इन एड के तहत स्वीकृत किया था लेकिन राज्य सरकार ने यह कहकर देने से इनकार कर दिया कि याची का विद्यालय वित्तपोषित नहीं है।
               अनिवार्य शिक्षा का कानून लागू होने के बाद राज्य सरकार ने निजी विद्यालयों को वित्तीय सहायता देने के बारे में कोई नीति नहीं तय की है।
                इसमें सुप्रीम कोर्ट के परिपूर्णानंद केस का हवाला भी दिया गया जिसमें राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि वह 1989 की नीति की समीक्षा करके संविधान के अनुच्छेद 21 ए के आधार पर नई नीति तय करे। अदालत ने निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन किया जाए।

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