बीएड और एमएड का कोर्स फिर से एक साल का ; कोर्स में बदलाव का सुझाव

              बीएड और एमएड का कोर्स फिर से एक साल का हो सकता है। वहीं बीटीसी कोर्स फिर दो साल का हो सकता है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने टीचर्स एजुकेशन रेग्युलेशन-2014 की समीक्षा शुरू कर दी है।  
              इसके लिए बनाई गई पांच सदस्यों की कमिटी की पहली बैठक में कॉलेजों ने बीएड, एमएड और बीटीसी कोर्स में बदलाव का सुझाव मजबूती से रखा है।
              इसके अलावा प्रैक्टिस टीचिंग बढ़ाने, एमएड में शिक्षकों की योग्यता के मानक ढीले करने सहित कई सुझाव इस बैठक में आए हैं।
             बीएड और एमएड पहले भी एक साल का होता था और बीटीसी दो साल का होता था। पिछली केंद्र सरकार ने टीचर्स रेग्युलेशन एक्ट में पिछले साल संशोधन किया। इस रेग्युलेशन में बीएड और एमएड के कोर्स की अवधि बढ़ाकर दो साल कर दी गई।
             वहीं बीटीसी का नाम बदलकर बीएलईडी कर दिया गया और इसकी अवधि बढ़ाकर चार साल कर दी गई।
             केंद्रीय कमिटी के रिपोर्ट के आधार पर मानव संसाधन मंत्रालय और एनसीटीई (राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद) ने पिछले साल इस रेग्युलेशन को मंजूरी दे दी।
             पिछले साल लागू किए गए नए रेग्युलेशन की समीक्षा के लिए केंद्र ने एनसीटीई के पूर्व चेयरमैन प्रो़ अख्तर सिद्दीकी अध्यक्षता में पांच सदस्यों की कमिटी बनाई गई थी।
              केंद्र की ओर से बनाई गई पांच सदस्यीय कमिटी की पहली बैठक रविवार को जयपुर में हुई। इसमें उत्तर क्षेत्र के आठ राज्यों के चुनिंदा कॉलेज प्रिंसिपल और निदेशकों को बुलाया गया था। सभी ने कहा कि दो साल का बीएड और एमएड करने के बाद से टीचर्स एजुकेशन के प्रति रुझान खत्म हो रहा है। इसे फिर से एक साल का किया जाए। इसी तरह बीटीसी को दो साल का किया जाए।
              कमिटी के सदस्यों ने कई सुझावों से सहमति जताई। ऑनलाइन सुझाव भी कमिटी ने मांगे हैं।इसे लागू किया। यूपी ने बीएड और एमएड में तो दाखिले इसी आधार पर लिए। इस साल 2015 में जो दाखिले हुए हैं, उसके अनुसार बीएड और एमएड दो साल के हैं। बीएड दो साल का हो जाने की वजह से छात्रों का रुझान काफी घट गया।
             ज्यादातर कॉलेजों में सीटें खाली रह गई हैं। बीएड में इस साल प्रदेश में 1.82 लाख सीटों में 1.10 लाख खाली रह गई हैं। इसी को देखते हुए कॉलेजों और छात्रों की ओर से लगातार यह मांग उठ रही थी कि पिछले साल लागू किए गए नए रेग्युलेशन में संशोधन  किए जाएं।





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