69 हजार शिक्षक भर्ती : जानें भर्ती प्रक्रिया में कौन-कौन सी है चुनौतियाँ ?क्या नई अड़चने फिर नियुक्ति में करेगी देरी!
बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा मुख्य परीक्षा का परिणाम भी जारी कर दिया गया है और नियुक्ति के अगले चरण की ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है।
सरकार भी जल्द-से-जल्द शिक्षकों को नियुक्त करना चाहती है। लेकिन इस भर्ती प्रक्रिया को लेकर उम्मीदवारों द्वारा बहुत सी आपत्तियां उठाई जा रही है।
अपनी समस्याओं के निराकरण के लिए उम्मीदवारों को कोर्ट का चक्कर तक लगाना पड़ रहा है।
आज इस आर्टिकल में आवेदकों से जुड़ी इन्ही मुद्दों पर प्रकाश डाल रहे हैं।
सबसे बड़ी समस्या 69 हजार सहायक अध्यापक भर्ती के लिए आवेदन करने वाले बीटीसी 2015 बैक पेपर के अभ्यर्थी के लिए हैं।
क्योंकि इन्हें इस नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर कर दिया गया है। उल्लेखनीयहै कि, इस भर्ती परीक्षा का शासनादेश 5 दिसम्बर 2018 को जारी हुआ और 6 जनवरी 2019 को हुई लिखित परीक्षा के लिए आवेदन की अंतिम तिथि 22 दिसम्बर 2019 थी।
दूसरी तरफ, परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय ने बीटीसी 2015 चतुर्थ सेमेस्टर का परिणाम 11 दिसंबर और तृतीय सेमेस्टर बैक पेपर का परिणाम 17 दिसम्बर 2018 को घोषित किया था।
फार्म में योग्यता प्राप्ति की तिथि आवेदन करने की तिथि को रखा गया था।
आवेदन करने की तिथि यानी 6 से 22 दिसम्बर 2018 के दौरान बीटीसी 2015 बैच के कुल 13765 प्रशिक्षु अयोग्य थे क्योंकि बैक पेपर के कारण उनके पास प्रशिक्षण के सभी अंकपत्र व प्रमाणपत्र नहीं थे। जिसके कारण उन्हें इस परीक्षा के लिए अयोग्य माना गया है।
इसके साथ ही 9 मई को जारी शिक्षक भर्ती परीक्षा की संशोधित उत्तरमाला को लेकर भी विवाद है।
परीक्षा नियामक प्राधिकारी का कहना है कि स्पेशलिस्ट कमिटी का गठन करके उम्मीदवारों द्वारा दर्ज किये गए सभी आपत्तियों का निस्तारण कर दिया गया है।
हिन्दी के तीन प्रश्नों पर जो पाठ्यक्रम के बाहर से पूछे गए थे उसमें सभी अभ्यर्थियों को समान एक-एक नंबर (कुल तीन-तीन नंबर) दे दिए गए हैं। लेकिन वैसे उम्मीदवार जो केवल एक-दो नंबर से असफल घोषित हुए हैं उन्हें इस संशोधित उत्तरमाला से संतुष्टि नहीं है।
सबसे अधिक विवाद नाथ सम्प्रदाय के प्रवर्तक को लेकर है. विषय विशेषज्ञों ने मस्त्येन्द्रनाथ को सही माना है जबकि छात्र तथ्यों के साथ गोरखनाथ को सही बता रहे हैं।
कुछ अन्य प्रश्नों पर भी विवाद है जिसे लेकर असफल अभ्यर्थी हाईकोर्ट का रुख कर रहे हैं।
उम्मीदवारों को आरक्षण के सम्बन्ध में भी आपत्ति है। सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों की मांग है कि वे लोग जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया के किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ लिया है उनको उसी आरक्षित वर्ग में सीट दिया जाना चाहिए।
इस प्रकार सामान्य अभ्यर्थियों को परिणाम प्रकाशन में हुए ओवरलैपिंग से विरोध है।
इसके साथ ही उम्मीदवारों ने कट ऑफ मार्क्स निर्धारित किये जाने के मानदंडों पर भी अपनी आपत्ति जताई है, हालांकि हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कटऑफ मुद्दे का निस्तारण करते हुए 6 मई को 60/65 प्रतिशत (जनरल केटेगरी के लिए 97 और ओबीसी, एससी, एसटी व अन्य रिजर्व केटेगरी के उम्मीदवारों के लिए 90 अंक) पर परिणाम जारी करने का आदेश दिया था। लेकिन इस आदेश को लेकर बहुत सारे उम्मीदवार संतुष्ट नहीं है जिनमें मुख्य नाम शिक्षामित्र का हैं।
शिक्षामित्रों का यह मानना है कि 1 दिसंबर 2018 को जारी शासनादेश में किसी भी प्रकार के कटऑफ का जिक्र नहीं था। इस प्रकार वे सरकार द्वारा जारी इस परिणाम को नियम विरुद्ध मानते हैं।
उनका कहना है कि 6 जनवरी 2019 को आयोजित परीक्षा के एक दिन बाद कटऑफ लागू किया। इस आधार पर हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शिक्षामित्रों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर दिया है।
कटऑफ लागू होने के कारण बड़ी संख्या में शिक्षामित्र चयन प्रक्रिया से बाहर हो गए हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि इस भर्ती प्रक्रिया के आगे आने वाली अड़चनें रुकने क नाम ही नही ले रही है
इस बार परिणाम के बाद सबकी उम्मीद यही थी कि जल्द ही नियुक्ति प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। लेकिन अब मामला न्यायालय तक पहुँचनें के बाद इस नियुक्ति प्रक्रिया को फिर लम्बा खींचने के आसार दिखने लगे हैं।
अब देखना यह है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय में गए मामले का की होता है।
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