शिक्षामित्र समायोजन मामला : नियमित बीटीसी करने वाले भी नहीं बन सके शिक्षक, अयोग्य की भीड़ में पिस गए योग्य

                बीटीसी का दूरस्थ प्रशिक्षण व टीईटी उत्तीर्ण करने वाले शिक्षामित्रों की भरमार है। ‘खराब मुद्रा अच्छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है’ अर्थशास्त्र में ग्रेशम का यह सिद्धांत शिक्षामित्रों पर बिल्कुल सटीक बैठता है। 
                 शिक्षामित्रों के समायोजन में जिन युवाओं में शिक्षक बनने की न्यूनतम अर्हता भी नहीं थी, उन पर अंगुली उठी, लेकिन उन युवाओं का भी समायोजन अवैध हो गया, जो सारी अर्हताएं पूरी करते थे। वजह आला अफसरों की अनदेखी है।
                 नियुक्ति की गलत प्रक्रिया शुरू होने एवं आरक्षण के नियमों का अनुपालन न होने से करीब पौने दो लाख शिक्षामित्र शिक्षक बनने की दौड़ से बाहर हो गए हैं।
                बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक स्कूलों में डेढ़ दशक पहले शिक्षामित्रों की तैनाती हुई थी। हर विद्यालय में दो-दो शिक्षामित्र रखे जाने से उनकी संख्या एक लाख 96 हजार तक पहुंच गई थी।
                 1999 में शासन ने निर्देश जारी किया, जो शिक्षामित्र बीएड पास होंगे उन्हें वरीयता दी जाएगी। इससे बीएड पास अभ्यर्थियों की शिक्षामित्र के रूप में तैनाती हुई, वहीं 10 अक्टूबर 2005 को आदेश हुआ कि अनौपचारिक शिक्षा में कार्य करने वालों को नियुक्ति में वरीयता मिलेगी। इससे अनौपचारिक शिक्षा में कार्य करने वाले शिक्षामित्र बने।
                 15 जून 2007 को शासनादेश हुआ कि जो शिक्षामित्र स्नातक हैं उन्हें बीटीसी की दस फीसदी एवं जो बीएड हैं उनका विशिष्ट बीटीसी की दस फीसद सीटों पर चयन किया जाएगा।
                  ऐसे में करीब 16 हजार शिक्षामित्र विशिष्ट बीटीसी करके एवं छह हजार बीटीसी करके नियमित शिक्षक पहले ही बन चुके हैं। इसके बाद भी विभाग में स्नातक, बीएड करके शिक्षामित्र बनने वालों की भरमार रही।
                2010 एवं 2011 सामान्य बीटीसी की दस फीसदी सीटों पर शिक्षामित्रों का चयन हुआ था। दूरस्थ बीटीसी करने वाले शिक्षामित्रों की तादाद तो काफी अधिक है उनमें से बड़ी संख्या में युवाओं ने टीईटी भी पास किया है। करीब तीस फीसद साथी टीईटी भी पास हैं।
                  इसकी वजह यह है कि 2011 में एनसीटीई के फरमान पर जब टीईटी अनिवार्य हुआ तो युवाओं ने उस परीक्षा में भी बैठना और उसे उत्तीर्ण करना शुरू किया।
                इस सारी कवायद पर उस समय पानी फिर गया, जब इंटर उत्तीर्ण युवाओं को शिक्षामित्रों बनाने पर अंगुली उठी। कहा गया कि शिक्षक बनने की न्यूनतम अर्हता स्नातक है तो इंटर उत्तीर्ण युवाओं को शिक्षक कैसे बनाया जाएगा।
                 यह प्रकरण हाईकोर्ट में जाने पर नियुक्ति अधिकारी पर सवाल उठे। कहा गया कि शिक्षकों की नियुक्ति बेसिक शिक्षा अधिकारी करता है आखिर ग्राम प्रधान की नियुक्ति कैसे मानी जा सकती है। ऐसे ही शिक्षामित्रों की नियुक्ति में आरक्षण के नियमों की भी अनदेखी हुई। लिहाजा सारे शिक्षामित्रों का हाईकोर्ट ने समायोजन अवैध घोषित कर दिया।
               अफसर यह भी मानते हैं कि कई शिक्षामित्र अर्हता रखते हैं, लेकिन उन्हें नियमित शिक्षक के रूप में इसलिए मौका नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उनकी नियुक्ति ही सही तरीके से नहीं की गई है।

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